पालखेड की लड़ाई (1728) का सामरिक और रसद प्रबंधन विश्लेषण
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https://doi.org/10.5281/vtvs3j59Abstract
प्रस्तुत शोध पत्र 28 फरवरी 1728 को पेशवा बाजीराव प्रथम और हैदराबाद के निजाम-उल-मुल्क के मध्य लड़े गए पालखेड के युद्ध का एक विस्तृत सामरिक, भौगोलिक और रसद (Logistics) विश्लेषण प्रस्तुत करता है। आधुनिक सैन्य इतिहास और सैन्य विज्ञान में पालखेड का युद्ध एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है, क्योंकि यह बिना किसी बड़े हिंसक आमने-सामने के टकराव या तोपखाने के भारी प्रयोग के केवल रणनीतिक युद्धाभ्यास, गतिशीलता और उत्कृष्ट रसद प्रबंधन द्वारा प्राप्त की गई एक पूर्ण विजय थी। इस शोध में दक्कन की विषम और शुष्क भौगोलिक परिस्थितियों को एक हथियार के रूप में उपयोग करने, दुश्मन की रसद एवं जल आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह नष्ट करने और गतिशीलता (Mobility) के माध्यम से एक भारी तोपखाने से लैस विशाल सेना को पंगु बनाने की बाजीराव की सैन्य विधा का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया गया है। यह पत्र दर्शाता है कि कैसे बाजीराव ने 'लिविंग ऑफ द लैंड' (जमीन पर जीना) की पद्धति और अभूतपूर्व सूचना तंत्र के बल पर शत्रु को आत्मसमर्पण के लिए विवश किया।
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Copyright (c) 2026 सक्षम अग्रवाल, शोधार्थी (इतिहास) एवं डॉ. रोमेश चित्रांशी, प्रोफेसर (Author)

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